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रात के करीब बारह बज रहे थे।
हल्की बारिश हो रही थी और सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था।
आरव अपनी बाइक रोककर उस पुराने हवेली के सामने खड़ा था।
लोग कहते थे — इस हवेली में कोई रहता नहीं…
लेकिन फिर भी रात में यहां से रोशनी दिखती है।
आरव एक ब्लॉग लिखता था — भूतिया जगहों पर रिसर्च।
आज उसने तय किया था कि इस हवेली का सच खुद जानकर रहेगा।
वह मोबाइल की टॉर्च ऑन करके अंदर घुस गया।
दरवाज़ा “क्रीईई…” की आवाज़ के साथ खुला।
अंदर धूल जमी थी, मकड़ी के जाले हर तरफ फैले थे।
दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें जैसे उसे घूर रही थीं।
अचानक—
ठक… ठक…
ऊपर से कदमों की आवाज़ आई।
आरव का दिल तेज़ धड़कने लगा।
“कोई है?” उसने कांपती आवाज़ में पूछा।
कोई जवाब नहीं।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ा।
ऊपर एक कमरा था, जिसमें एक पुरानी अलमारी रखी थी।
अलमारी खुली हुई थी… और अंदर एक डायरी।
उसने डायरी उठाई।
उसमें लिखा था—
अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो मैं अब इस दुनिया में नहीं हूं।
इस हवेली में जो भी आता है, उसकी किस्मत बदल जाती है…
आरव ने पन्ने पलटे।
पिछले सौ सालों में यहां आने वाले कई लोगों के नाम लिखे थे।
और आख़िरी नाम…
आरव शर्मा
उसके हाथ कांप गए।
“ये कैसे मुमकिन है?”
तभी पीछे से ठंडी सांसों की आवाज़ आई।
उसने पलटकर देखा—
एक धुंधली परछाईं खड़ी थी।
आंखें खाली… चेहरा अधूरा।
“तुम बहुत देर से आने वाले थे…”
उस आवाज़ ने कहा।
कमरे की लाइट अचानक बंद हो गई।
आरव चीख भी नहीं पाया।
सुबह लोग हवेली के बाहर उसकी बाइक खड़ी देख पाए।
लेकिन आरव…
कभी वापस नहीं मिला।
और तब से…
रात में उस हवेली की खिड़की से एक नई परछाईं दिखाई देने लगी।


